वही सरद हवा अब चुभने लगी है मुझे…
December 7th, 2007
दो कदम ही चला था पर जब कदमो को देखा तो
साथ साथ ही थे वो
वक्त तो अपनी ही धुरी पर था
पर मैं ही वक्त के आगे था कही
मुड के देखा वो आँख लगाये पुल पे खढी थी
वो मौसम िक सरद हवा जैसे मेरे िदल मे समा रही थी
िदल ने चाहा जैसे बस
वक्त युही थम जाये कही

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The virtue of reason, the value of knowledge, and the influence of faith in my own ability to dream and achieve some...Quest of Life