There is nothing around me…
इस वक़्त तो लगता है कुछ भी नहीं है
महताब ना सूरज ना अन्धेरा ना सवेरा
आँखों के दरीचे में किसी हुस्न की झलक
और दिल की पनाहों में किसी दर्द का डेरा
मुमकिन है कोई वहम हो मुमकिन है सुना हो
गलियों में किसी चाप का एक आखिरी फेरा
साखो में ख्यालों के घने दरख्त की शायद
अब आके करेंगा न कोई ख़वाब बसेरा
इक बैर ना इक महर ना एक रब्त ना रिश्ता
तेरा कोई अपना ना पराया कोई मेरा
मन की ये सुनसान घडी सख्त बड़ी है
लेकिन मेरे दिल ये फ़क़त एक घडी है
हिम्मत करो जीने को अभी उम्र पड़ी है
- फैज़ अहमद फैज़