वही सरद हवा अब चुभने लगी है मुझे…
दो कदम ही चला था पर जब कदमो को देखा तो
साथ साथ ही थे वो
वक्त तो अपनी ही धुरी पर था
पर मैं ही वक्त के आगे था कही
मुड के देखा वो आँख लगाये पुल पे खढी थी
वो मौसम िक सरद हवा जैसे मेरे िदल मे समा रही थी
िदल ने चाहा जैसे बस
वक्त युही थम जाये कही
वो हाथो मे हाथ ले कर
उस सूरज को दूबते हुए देखा
तो युही ज़`हन मे आया बस
अब एक नयी सुबह होगी
एक वादा िकया जलद िमलने का
साल बीत गया वो आज भी वही है
वही पुल था पर बदले थे िरशते कही
वकत के खेल है िनराले
वही सरद हवा अब चुभने लगी है मुझे
- अिमत

December 7th, 2007 at 1:50 pm
वकत के खेल है निराले.
सही कहा. बढिया.
December 7th, 2007 at 10:08 pm
wahi sard hawaa ab chubhne lagi hai… sigh… kitni aasaani se keh jaate hain aap hum kahiyon ke mann ki baat…